भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क (व्यापार समझौते की रूपरेखा) ने दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को नई दिशा देने का वादा किया है। लेकिन इस डील के खिलाफ भारत में किसान संगठनों का विरोध तेज़ हो गया है।
डील के मुख्य बिंदु क्या हैं?
फरवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय सरकार के बीच इस समझौते पर सहमति बनी। इसके तहत:
- भारत पर लगने वाला औसत टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया गया
- रूसी तेल खरीद पर लगने वाली अतिरिक्त 25% पेनल्टी टैरिफ हटा दी गई
- भारत ने अमेरिका से आने वाले कई औद्योगिक उत्पादों, कुछ खाद्य वस्तुओं और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करने या खत्म करने का वादा किया
सरकार का दावा है कि इस डील से भारतीय निर्यात को बहुत बड़ा बढ़ावा मिलेगा और यह 100 अरब डॉलर के पार जा सकता है।
संवेदनशील कृषि उत्पादों को डील से बाहर रखा गया – सरकार का दावा
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि इस समझौते में निम्नलिखित संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को पूरी तरह बाहर रखा गया है:
- डेयरी उत्पाद (दूध, पनीर, घी, दही आदि)
- पोल्ट्री (चिकन, अंडे)
- चावल
- गेहूं
- चीनी
- कई प्रकार के फल और सब्जियां
सरकार का कहना है कि लगभग 90–95% भारतीय फार्म उत्पाद इस डील के दायरे से बाहर हैं, ताकि देश के छोटे-मझोले किसानों को कोई नुकसान न हो।

किसान संगठनों का आक्रोश और सड़क पर उतरना
लेकिन किसान संगठन सरकार के इस दावे से सहमत नहीं हैं। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इस डील को “किसानों के साथ धोखा” और “अमेरिकी कंपनियों के लिए आत्मसमर्पण” करार दिया है।
12 फरवरी 2026 को देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में किसानों ने ट्रेड डील की प्रतियां जलाकर विरोध जताया।
किसानों की प्रमुख मांगें और डर
- अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भारी सब्सिडी के कारण वे बहुत सस्ते दामों पर भारत में बिक सकते हैं
- इससे भारतीय बाजार में डंपिंग का खतरा
- छोटे किसानों की आजीविका पर गहरा असर
- बीज, खाद, कीटनाशक में अमेरिकी कंपनियों का एकाधिकार बढ़ने का डर
राकेश टिकैत (भारतीय किसान यूनियन) ने कहा: “यह डील देश के अन्नदाताओं को बेचने की साजिश है। हम इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।”
विपक्ष का हमला और राजनीतिक बयानबाजी
विपक्षी दलों ने भी इस डील की कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा:
“यह ट्रेड डील नहीं, बल्कि भारत को अमेरिका का डंपिंग ग्राउंड बनाने की साजिश है।”
कई विपक्षी नेताओं ने किसान संगठनों से मुलाकात कर उनका समर्थन किया है।
क्या यह डील अंततः फायदेमंद साबित होगी या विवाद बढ़ाएगी?
एक ओर भारत-अमेरिका के बीच मजबूत व्यापारिक रिश्ते देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे माने जाते हैं। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र में छोटे किसानों की रक्षा करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
अभी तक डील का केवल अंतरिम फ्रेमवर्क तैयार हुआ है। अंतिम समझौते में कई बदलाव हो सकते हैं। लेकिन अगर किसानों का भरोसा नहीं जीता गया, तो आने वाले महीनों में यह मुद्दा बड़ा आंदोलन बन सकता है।
क्या सरकार किसानों के डर को दूर कर पाएगी? या यह ट्रेड डील भी पिछले कई कृषि कानूनों की तरह विवादों में ही उलझकर रह जाएगी? अगले कुछ हफ्ते इस सवाल का जवाब देंगे।









